CCE के हक़ में एक पड़ताल
मैं CCE को दो छोर से देखता हूँ एक प्रगतिवादी व नवाचारी
शिक्षक की नजर से दुसरा इककीसवीं शताब्दी के अभिवावक की नजर से I दुर्भाग्यवश CCE
जो की मात्र एक मुल्याकन का नया दृष्टिकोण था उसे अन्यथा लिया गया इसके लिए
अभिवावक, विद्यालय, शिक्षक और कुछ हद तक
हमारे छात्र, सभी उतरदायी हैं I नीति निधारक की ओर से जल्दबाजी व मूलभूत -ढांचे में कमी भी CCE को
सर्वप्रिय नहीं बना पाया I
लेकिन बालक के 365 दिनों के सर्वांगिण विकाश का मूल्याकन ,घडी की सुई के
तीन चक्र भर में, चंद प्रश्नों के रटे- रटाए उतर लिख भर देने से किया जाए ये भी तो
कतई सही नहींI कुछ एक सूत्र ,चंद परिभाषाएँ व लेख पत्र लिख लेने से मुझे कदाचित
नहीं लगता कि हम अपनी आने वाली पीडी को 2040-50 के लिए तैयार कर रहे हैं I जब कि
social मीडिया सब मीडिया पर भारी पड़ता , डाकघर में पत्रों के नाम पर सुखा है
,ग्रीटिंग कार्ड् अब कहाँ हैं ,ईमेल ,SMS व whatsapp अब ज्यादा व्यावहारिक जान
पड़ते हैं I हम घडी कि सुइयां को पढना भले ही अपने स्कुलों में सिखाते रहे पर हकीकत ये है कि अब घड़ियाँ
कलाइयों के साथ–साथ समाज से भी लुप्त हो रही हैं और जो इस्तेमाल में है वो सब
नंबर्स वाली डिजिटल घड़ियाँ हैं I
आज कि पीडी स्वयं सोच कर देखे तो तो उसने कितने त्वरित तकनिकी पतिवर्तन
देखे हैं I पिछेले 10 साल में किस तरह से
हमारे जीवन में टेक्नोलॉजी कि घुसपैठ हुई है
वो हमसे छिपा नहीं है चाहे ATM की बात हो, हर हाथ में स्मार्ट फोन हो,
ऑनलाइन शौपिंग से लेकर ये फेहरिस्त काफी लम्बी हो जाती हैI यहाँ ये बताना भी
मुनासिब होगा कि ये सब हमारी या हमसे पहली वाली पीडी कि देन है ये पीडी कितना कुछ करेगी उसके बारे में सोचना
भी अभी मुश्किल होगा , लेकिन जहाँ से मैं देखता हूँ और मुझे गर अतिवादी न समझा जाए तो ये आने वाले
वर्षों में दुनिया को एक अभूत्पूर्ब परिवर्तन का साक्षी होना पड़ेगा I
हम न भूले हमें हमारे बुजुर्गों ने , स्वाभिमान से
जीने के लिए एक स्वंतत्र राष्ट्र सोंफा था
और गुरुवर रविंदर नाथ टेगौर ने लिखा था “
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